हे पहाड़ी बतो त्वेन क्या पाई…..
ऊं झंगटों मा आश लगे,जोंकु द्वी दिनों कु सारू रेन्दु,
रिस्ता किले नी बणी सकी तेरौ,माटी हवा अर पाणी से,
लगदा ता लम्बा-तम्बा अर डमडमा छन यूँ ठाँकरा,
निभै नी सकदा जिम्मेदारी, यन छन रणबांकुरा,
खैर खबर यू जनु भि आई,जनु-कनु भि बस दिखदी राई,
हे पहाड़ी बतो त्वेन क्या पाई…..
पीड़ा वी च अर रोग पूराणु हूण बैठि ग्यायी,
यू ता सोचि नि छौ, यनु कनु त्वेन राज्य बणाई,
टिकदा नी मंत्री यख, क्वि बुना बस बिकदा चा,
सांप जन बस देरादून अर दिल्ली रिटदा चा,
यनि कनि सरकार त्वेन यूं सालों मा बणाई,
हे पहाड़ी बतो त्वेन क्या पाई…..
घर बार छोड़ी तु परदेसों मा दिन काटणु रेन्दु,
बते दे जु पुछदु, त्वे पहाड़ मा क्या-क्या चैन्दो,
चार सौ बीसों का जंजालों मा, पहाड़ों कि तिरछी ढाल मा,
सब्बि अरमान अर स्वेणा खती ग्यायी,
भोत कुछ बच्यों छौं जु त्वेन मिथे नि बताई,
- मस्त पहाड़ी
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